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Sunday, 24 May 2020

प्यार

प्यार का मतलब बताते फिरते हर किरदार
जब कि प्यार को कभी दिल में उतारा ही नहीं;

प्यार की रट लगा, प्यार के नाम पर रुलाते यार,
पर कभी प्यार की नींव को संवारा ही नहीं;

प्यार नहीं, हो जैसे कोई जान लेवा ज्वर बुखार,
ऐसे बिमार प्यार से दिल को कोई वास्ता ही नहीं,

प्यार में जिसे अपने स्वार्थ से बस सरोकार,
ऐसे नासमझ के दिल में प्यार कभी उतरा ही नहीं

प्यार में न कर ए अनुपम अपना सब न्योछावर,
ये प्यार टूटा है दिल में, तेरे बस का ही नहीं।

अनुपम मिश्र

Saturday, 23 May 2020

Rooh


Andhi Kanoon

उस कवि से क्या कहूं

उस कवि से क्या कहूं
ख्वाब जिसने बुने कई
पर उन्हें कभी सजा न पाया,
दिल में उमड़ते तरंगों को
कभी शब्दों में गा ना पाया;

प्यार तो था बेशुमार भीतर
पर लबों पर कभी ला न पाया,
मन की बात मन में दबा गया,
राज सारे साथ अपने ले गया
कब्र में सब यूं ही दफन हो गया;

जीवन पर्यन्त बस यही मानता रहा,
शब्दों से उसका सरोकार नहीं,
भावों को शब्दों की दरकार नहीं,
भीतर के कवि को यूं ही घोटता रहा,
बिन कहे सुनाने का ढोंग करता रहा;

जहां संवेदना है, वहां कवि है,
कवि की भला कौन जाति होती है,
कवि तो हर रंग, रूप व भेष में है,
समय से परे वो हर परिवेश में है,
बस उसे शब्दों की गरज़ होती है;
©अनुपम मिश्र

Thursday, 21 May 2020

प्यार एक कारोबार

प्यार भी एक तरह का कारोबार है
कभी भी अप्रत्यासित मुनाफा या नुकसान
का सामना होता इसमें हर बार है।
कभी तो बिन मांगे प्रेम की होती है बरसात
तो कभी हृदय का आखिरी बूँद भी होता बेज़ार है।
जो टूट कर बिखर जाये या हो बेजान,
सबका मूल कारण बस गुस्ताख प्यार है।
Anupam Mishra

ख्वाईश


देखा है हमने एक एक कर सारे हाथ छूटते हुये,
कितने ही रिस्तों को बनते व बिगड़ते हुये,
अरमानों की सजी धजी सेज़ को उजड़ते हुये,
ऐसा नहीं कि प्यार भरा साथ नहीं मिला हमें,
पर जिस हृदयांगन में प्रेम के सागर की प्यास हो
उसे सरोवर की कुछ घूँटों से कहाँ चैन मिले,
अब तो इतनी ही ख्वाईश जेहन में ज़िंदा है,
इन सुलगती लहरों में तृप्ति का एहसास मिले।
©अनुपम मिश्र

कौन अपना आखिरी किरदार

पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है
अभी ही तो नन्ही नासमझ कन्या थी,
न जाने कब उम्र से प्रौढ़ युवती बन गयी,
हर पल एक नया किरदार निभाती रही,
जमाने के मुताबिक स्वयं को ढालती रही,
पर डर अब हमें भी वही सताने लगा है,
जिसने हर शख्स को स्तब्ध कर रखा है,
हमें भी इस मंच के छूट जाने का डर है,
क्या पता कौन अपना आखिरी किरदार है!
©अनुपम मिश्र

दिमाग

दिमाग के पलरे को जो हलका कर लिया
तो दिल जीने न देता है,
सोचता तो कुछ भी नहीं
धड़क धड़क कर बावला कर देता है;
सिर्फ भावों से क्या होता है,
जीने को, सोचना भी तो होता है;
जो सोचा न, तो दिल टूटता ही रहता है।
©अनुपम मिश्र

ज़िंदगी और मौत

ज़िंदगी और मौत का फासला इतना ही है
चाहो तो एक पल में ही तय कर लो
और चाहो तो राह परखते रह जाओ,
पर हर हाल मेें अंजाम होता एक ही है।
©अनुपम मिश्र

कब तक भागेगा

कब तक भागेगा रे बंदे तू?
रास्ते भले ही कभी खत्म न हो
पर तेरी साँसे तो रूक जायेंगी,
किसी भी मोड़ पर साथ छोड़ जायेंगी;
क्या बटोड़ने चला है आज तू?
बता कब तक संभाल रखेगा उसे तू?
तू तो कुछ पल बाद पंच तत्वों में घुल जायेगा
बता फिर अपनी अमानत कहाँ छोड़ता जायेगा?
©अनुपम मिश्र

चुलबुली खुशी

चुलबुली खुशी मदमस्त हो हृदय से मेरे झाँक रही थी
बाहर निकलने का रास्ता अपना टुक टुक ताक रही थी,
कुछ बेचैनी सी थी, कुछ घबराहट सी जो उसे दबा रही थी,
खुशी के हर उम्मीद व मौके पर वो डर का परदा डाल रही थी,
पर वो नादान ओठो से ही सही, मुसकान बन बाहर आ रही थी
हर छोटी से छोटी बात पर झूम कर नृत्य किये जा रही थी।
© अनुपम मिश्र

खुले में चलना

अँग्रेजी फ्रॉक पर पेंसिल हिल सैंडल डाल,
अपने ओंठो पर लगायी हमने लिपस्टिक लाल,
काला चस्मा आँखों पर चढ़ा चल पड़े मदमस्त चाल,
कॉफी हाउस में आने को उसने किया था हमें कॉल,
जिसकी तरह हम भी बनना चाहते थे स्वीट डॉल;
कॉफी का ऑर्डर दिया बढ़ाने को अपनी शान,
कुछ ही पल में कॉफी मिली करने को उसका पान,
बालों पर अटके चस्में ने चलायी अपनी ऐसी बाण,
फिसला मग हाथ से, किया कॉफी में हमने स्नान,
पेंसिल हिल की अपनी छूटने थे तभी ही प्राण,
पल भर में ही धूल गया अपना सारा झूठा सम्मान,
पर किसी की प्यारी एक बात ने डाल दी नयी जान,
"करना ही क्यूँ भला किसी की तरह बनने का प्रयास
जब खुद पर हो खुद को अटूट प्यार व विश्वास।"
बस फिर क्या था फेंका मग, उताड़ा सर से चस्मा,
खुले पैर फिर से शुरू कर दिया खुले में चलना।
©अनुपम मिश्र

फूलों में काँटें

पथ चाहे पथरायी हो या फूलों भरी
फर्क कहाँ पड़ता इससे कभी भी,
पग तो डगमगाते दोनो राहों में समान ही,
पत्थर के नोंक छिपे नहीं होते कहीं,
पर फूलों में काँटें छिपे होते कहीं भी।
©अनुपम मिश्र

लाल बिंदी



आसमान की लाल बिंदी धूँधली हो चली
अँधियारे ने सभी को अपनी छाव में ले ली,
पर इतना तो तय था, कल फिर एक नई सुबह होगी
कुम्हलायी बदरंग धरती फिर दुलहन सी सजेगी,
नई रौशनी में कई नई कहानियाँ लिखती जायेगी
और अंत में फिर यूँ ही अँधेरे के आगोश में सो जायेगी।
©अनुपम मिश्र

हथकड़िया खोल डाली

खुद को खुद ही हथकड़ियों से जकड़े रखा
न जाने कब तक खुशी को खुद में बाँधे रखा
दिल को हरदम ही सुकून ढूँढने में व्यस्त रखा,
जो था भीतर उसे भीतर ही कैद कर घुटते रखा,
आज खुद ही खुद की हथकड़िया खोल डाली,
जैसे चारों ओर बस नज़र आती अब बस हरियाली।
©अनुपम मिश्र

खुद से ही फिर से प्यार

फिर से उड़ने लगी हूँ उसी शिखर को छूने को
गिरकर जहाँ से कई बार उड़ना ही भूला दिया,
फिर से वही जूनून सा सवार हो गया है,
मुझे खुद से ही फिर से प्यार हो गया है;
डर नहीं किसी के तीर का जिससे जख्म गहरे हुये
डर नहीं भटकने या ऊँचाई से फिर गिर जाने का!
©अनुपम मिश्र

चाय


चाय
किताबों में जब उलझे रहे रात रात
ताकि कुछ प्रश्नों से पा सके निजात,
तब नींद की क्या ही थी बिसात,
चाय की चुस्की से देते उसको मात।
©अनुपम मिश्र

इंपोर्टेड


क्यूँकि मुझे देश से प्रेम है
देश की आबादी से प्रेम है
उसकी बढ़ती गरीबी से प्रेम है, 
मुझे तो इंपोर्टेड ही चाहिए।

दिखाए कैसे कि हम अमिर हैं
नहीं कोई गरीब फकीर हैं
हम तो अपनी हैसियत बनाऐंगे
इंपोर्टेड ला सबको दिखाऐंगे।

चावल, दाल, गेहूँ का दाम लगाने में
जाने हम कितना सर खुजाऐंगे
पर पिज्जा बरगर पे जमके लूटाऐंगे
क्यूँकि हम इंपोर्टेड ही खाऐंगे।

दूध, चीनी और चैन को तो वह तरसता है
जो भरी दूपहरी में खेतों में खलिहानों में
न जाने कैसी बेतुकी कसरत करता है
पर हमारा दिल तो इंपोर्टेड पर धड़कता है।

इससे भला हमें क्या फर्क पड़ता है
चाहे तस्करी हो या काला बजारी
हमारे घर तो सब आ जाता है
तभी तो इंपोर्टेड इतना भाता है।
(composed it 20 years ago 😊)
©amritsagar

बेतूके सवाल


कितने ही सवाल ऐसे हैं ज़ेहन में
जो रहने न देते कभी होश में
ढूँढते जवाब बाहर भीतर
हर किसी के अवलोकन में।

सवाल यूँ ही न उठे मन में
परिणाम यह परिस्थितियों का जीवन में
शून्य ही था दिलो दिमाग बालपन में
जिसने जो कहा वही आया समझ में।

फरिस्ता बन कर आया कोई यौवन में
मांग भरी सब को साक्षी मान जिसने
मेरे सच और सपने सब बसते थे उसी में
सारी दुनिया सिमट गई उस एक में।

हमने देखा प्रेम की प्रतिमूर्ति उनमें
जो टूट गया कुछ ही दिनों में
गृहस्वामिनी बनाकर रखा था जिन्होंने 
गृहत्यागी बनने को मजबूर किया उन्हींने।

जिसके साथ बुने थे भविष्य के सपने
निकल परे वो करके उम्मीदों के टुकड़े।
दस साल बाद ये आई उन्हें समझ में
कि महत्व नहीं कोई हमारा उनके जीवन में।

तब से लगे हैं दिलो दिमाग में
अनगिनत सवाल यूँ रेंगने
कि सच और सपने के बीच में
पड़े फासले की दीवार लगे ढहने।

मिल जाते हैं जो भी राही राह में
उनसे ही लगते हम न जाने क्या पूछने
कि वह सर पकड़ दूरी बना लगते भागने
फिर भी इस विक्षिप्त को न आता समझ में।
©amritsagar

Decision

Whether to sit or stand straight, Whether to strol or run fast, Whether to end or start, Whether to go Left or Right; No way is wrong or Rig...